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Sunday, February 26, 2012

"मोह की झफ्फी"

गर्मी के दिनों में 
टिमटिमाते तारों की 
टिम टिमाती लौ में  
सो रहे थे हम 
खाट बिछा आँगन में 
अधखिली रात में
जब चलती थी पुरवाई 
अचानक पड़ोस से 
वह दीवार फाँद आई 
हरी कचूर वह 
नाज़ुक मासूम - सी 
चुपचाप आकर
दीवार से वह लगी थी 
सुबह की लालिमा तक 
न जाने मैंने कितनी दफा
उसे बार-बार देखा था 
लगता वह बातें करती 
मन पगला -सा हो गया 
दो शब्दों की आज तलक 
साँझ न पड़ी जहाँ 
मिलें तो मेले '
वाली बात हुई थी
धीरे से सरकती 
झूमती -सी रात को 
बंदिशों को लाँघकर 
घर हमारे वह आई थी 
वह थी 
कद्दू की वेल
जिसने ...............
अनजाने एक घर की 
हमारे दिल आँगन से 
साँझ की झफ्फी डाली थी 
और अब 
आँगन के हर कोने से 
मीठे मोह की खुशबू
आँखों में तैर आई थी 

हरदीप 

11 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मोह की झप्पी ... सुंदर प्रस्तुति ...

kshama said...

Wah!

Kailash Sharma said...

वाह! बहुत सुंदर प्रस्तुति...

वन्दना said...

वाह बहुत मोहक अन्दाज़

Udan Tashtari said...

कद्दु की मोह भरी झप्पी भी खूब रही..बेहतरीन.

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन भाव ..

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 27-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

सहज साहित्य said...

कहते हैं कविता के लिए विषयों की कमी नहीं,सिर्फ़ तलाश करने वाली नज़र चाहिए। वह नज़रिया हरदीप जी के पास है,जो हरी कचूर कद्दू की बेल में भी । बेल सचमुच प्याई ही नहीं शरारती भी है ;क्योंकि-
अधखिली रात में
जब चलती थी पुरवाई
अचानक पड़ोस से
वह दीवार फाँद आई
हरी कचूर वह
नाज़ुक मासूम - सी
चुपचाप आकर
दीवार से वह लगी थी
सुबह की लालिमा तक
न जाने मैंने कितनी दफा
उसे बार-बार देखा था ।
इस प्यारी कविता के लिए बहुत बधाई !

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत सुन्दर... वाह!

Reena Maurya said...

सुन्दर प्रस्तुति...
:-)

Rakesh Kumar said...

आपकी प्रस्तुति लाजबाब है,
अदभुत मोहक मृदुल अहसास जगाती.

पढकर मन मग्न हो गया है.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,हरदीप जी.
मेरे ब्लॉग पर आईएगा.
'मेरी बात...' पर कुछ अपनी भी कहिएगा.