मुक्ति...
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मुक्ति...
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शेष है
अब भी
कुछ मुझमें
जो बाधा है
मुक्ति के लिए
सबसे विमुख होकर भी
स्वयं अपने आप से
नहीं हो पा रही मुक्त
प्रतीक्षारत हूँ
शायद
...
Wednesday, February 8, 2012
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14 comments:
अपने पास से निकले
अपने हमउम्र समय की
मैंने तलाश की
समय को हम उम्र बताना नया प्रयोग तो है ही साथ ही उस हम उम्र की तलाश करने पर भी वह नहीं मिल पाता ।
हर बीता पल /आज मुझे / एक सपना सा लगता है !
इन पंक्तियों में सपना लगना उस तलाश को और तीव्र करता है । हरदीप जी यह तो गागर में सागर भर दिया आपने ।
Ye chhoti-si rachana bada gahan arth samete hue hai!
कहना तो क्या है...अहसासना है.
बेहतरीन!!
कल 09/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
आपकी पोस्ट चर्चा मंच 9/2/2012 पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-784:चर्चाकार-दिलबाग विर्क
बहुत सुन्दर खुबसूरत रचना। धन्यवाद।
बहुत प्यारी बात!
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति...
सादर..
हा बिता हुआ पल सपना ही तो हो जाता है ...
बहुत सुन्दर ,,
सच्ची बात ...
बहुत गहन .. हमउम्र समय की तलाश ..बहुत सुन्दर
हर बीता पल
आज मुझे
एक सपना सा लगता है !
....बहुत खूब! कुछ शब्दों में बहत कुछ कह दिया..
सच है बीते पल एक सपने के समान ही लगते हैं. सुंदर प्रस्तुति.
बधाई.
अत्यंत सुन्दर ..
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